शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

पानी ही पानी


जहाँ तक नज़र जाये हर जगहे पानी
फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी

मिनिस्टर के घोटालों में नोटों की धार का पानी
मजदूर की मेहनत में लाल रंग का पानी
मजबूर की आँखों के कोरो में पानी
फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी

विष्णु के चरणों में पानी ब्रह्मा के कमंडल में पानी
शिव की जटाओं में पानी

फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी
हिमालये की गोद में पानी भागीरथ की भक्ति में पानी
हर की पोरी में मैला कुचला गंगा का पानीफिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी
किसान के बुझे चहरे पर पानी
आसाम बिहार में जगह जगह पानी
गागर में सागर जैसा पानी
फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी

कागजी नहरों में बहता पानी
नगर पालिका के नल में पानी
बरसातों में घर घर में दिखता पानी
फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी

भारतीय नारी की लज्जा हो गई पानी
भारतीय संस्कृति हो गई पानी
ये सब देख मैं भी शर्म से हो गया पानी पानी और पानी
फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी

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