शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

इश्क

न मैं दीवाना न पगला
न मैं आशिक न मैं अफसाना
मैं तो हूँ सबसे अलग
उसे दिल से नहीं
अपनी रूह अपने जिस्म
अपने हर साँस
से चाहने वाला
वो रूह जो कभी मरती नहीं
वो जिस्म जो जल कर भी मिटता नहीं
वो साँस जो अमर है इस ब्रह्माण्ड में
अरे दिल्लगी करने वालो
तुम क्या जानो प्यार क्या होता है
ये मुझ से सीखो प्यार कैसे होता hai

पानी ही पानी


जहाँ तक नज़र जाये हर जगहे पानी
फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी

मिनिस्टर के घोटालों में नोटों की धार का पानी
मजदूर की मेहनत में लाल रंग का पानी
मजबूर की आँखों के कोरो में पानी
फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी

विष्णु के चरणों में पानी ब्रह्मा के कमंडल में पानी
शिव की जटाओं में पानी

फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी
हिमालये की गोद में पानी भागीरथ की भक्ति में पानी
हर की पोरी में मैला कुचला गंगा का पानीफिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी
किसान के बुझे चहरे पर पानी
आसाम बिहार में जगह जगह पानी
गागर में सागर जैसा पानी
फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी

कागजी नहरों में बहता पानी
नगर पालिका के नल में पानी
बरसातों में घर घर में दिखता पानी
फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी

भारतीय नारी की लज्जा हो गई पानी
भारतीय संस्कृति हो गई पानी
ये सब देख मैं भी शर्म से हो गया पानी पानी और पानी
फिर भी इंसान कहता है पीने को नहीं दो बूंद पानी

रविवार, 27 मार्च 2011

आँखों की भाषा


दिल की बात होठों तक लायी नहीं जाती
राज की बात सरेआम बताई नहीं जाती
आँखों की भाषा पढने वालों को
हर बात लफ्ज़ों से समझाई नहीं जाती